ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक के लिए डायमंड हार्बर से जीत की हैट्रिक लगाना कितना मुश्किल ?

“इस इलाक़े में 15 साल से तृणमूल कांग्रेस सांसद होने के बावजूद ग्रामीण इलाक़ों में सड़कों और पानी की समस्या है. लेकिन इस बार विपक्ष ने यहां कमज़ोर उम्मीदवार उतार कर पार्टी के उम्मीदवार अभिषेक बनर्जी की हैट्रिक की राह बेहद आसान बना दी है.”

कोलकाता के सियालदह स्टेशन से डायमंड हार्बर जाने वाली लोकल में बातचीत के दौरान एक सब्ज़ी विक्रेता सोमेश्वर गिरि इस सीट के बारे में अपनी राय कुछ इस तरह से जताते हैं.

वो ये भी कहते हैं, “इलाक़े में इस बात की भी चर्चा है कि शायद यहां भाजपा और तृणमूल में सेटिंग हो गई है. भाजपा उम्मीदवार अभिषेक के मुक़ाबले काफी कमज़ोर हैं. तमाम समस्याओं और आरोपों के बावजूद इस बार भी तृणमूल कांग्रेस की जीत लगभग तय है.”

इलाक़े में सोमेश्वर गिरि की राय से इत्तफाक़ रखने वालों की कमी नहीं हैं. पश्चिम बंगाल में सातवें और आख़िरी चरण में जिन नौ सीटों पर मतदान होना है उनमें यह सीट सबसे वीआईपी मानी जा रही है.

लेकिन इसकी कहीं ज़्यादा चर्चा नहीं हो रही है. शायद इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यहां लगातार तीसरी बार अभिषेक बनर्जी की जीत पर कम ही लोगों को संदेह है.

अधिकतर लोग ये मानते हैं कि इसकी वजह यहां विपक्षी उम्मीदवारों का कमज़ोर होना है.

डायमंड हार्बर बाज़ार में एक दुकानदार मनोजित सांतरा कहते हैं, “यहां उनकी (अभिषेक) जीत तो तय है. अब देखना यह है कि वो पिछली बार की जीत का अंतर कितना बढ़ा पाते हैं.”

अभिषेक बनर्जी ने वर्ष 2019 में यह सीट 3 लाख 20 हज़ार से ज़्यादा वोटों के अंतर से जीती थी. वह भी तब जब वो महज पार्टी की युवा शाखा के प्रमुख थे.

लेकिन बीते पांच वर्षों के दौरान उनका पद और कद तेज़ी से बढ़ा है. अब संगठन में वो ममता बनर्जी के बाद नंबर दो पर हैं.

पार्टी और बंगाल के राजनीतिक हलकों में उनको निर्विवाद तौर पर ममता का उत्तराधिकारी मान लिया गया है. ऐसे में यहां लोगों का कहना है कि इस बार सवाल उनकी जीत का नहीं बल्कि जीत के अंतर का है.

इस सीट की अहमियत को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बुधवार को इलाक़े में एक चुनावी रैली को संबोधित किया. दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने भी यहां रोड शो किया है.

15 सालों से टीएमसी के झोली में सीट

दक्षिण चौबीस परगना ज़िले की यह संसदीय सीट वर्ष 2009 में पहली बार तृणमूल कांग्रेस की झोली में आई थी.

उस साल वहां प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सोमेन मित्रा टीएमसी के टिकट पर जीते थे.

उन्होंने सीपीएम के शमीक लाहिड़ी को करीब डेढ़ लाख वोटों से हराया था. उससे पहले यह सीट वाममोर्चे का मज़बूत क़िला रही थी.

वर्ष 2014 में अभिषेक पहली बार यहां से चुनाव लड़ कर क़रीब 71 हज़ार वोटों से जीते थे.

इस बार तृणमूल कांग्रेस के लिए सांसद के तौर पर अभिषेक का कामकाज और राज्य सरकार की ओर से शुरू की गई विभिन्न कल्याण योजनाएं मुद्दा रही हैं तो विपक्षी दलों ने तमाम हलकों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और इलाक़े में तृणमूल कांग्रेस के कथित आतंक को अपना मुद्दा बनाया है.

तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं की दलील है कि अभिषेक बनर्जी ने इलाक़े में सांसद के तौर पर काफी काम किया है. उन्होंने ‘डायमंड हार्बर फुटबॉल क्लब’ शुरू करने के साथ ही इलाक़े के लोगों के लिए पूरे साल हेल्पलाइन खुली रखी है.

‘डायमंड हार्बर मॉडल’

इलाके में ‘डायमंड कप’ नामक फुटबाल प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है. हर साल यहां संगीत समारोह भी होते रहे हैं. उनमें सोनू सूद से मीका और हिमेश रेशमिया तक शिरकत करते रहे हैं.

कोरोना के दौरान उन्होंने यहां इलाज और राशन देने की अलग व्यवस्था की थी. तब यहां राजनीतिक हलकों में इसे ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ कहा गया था और की खासी चर्चा रही थी.

अभिषेक अपनी चुनावी सभाओं में डायमंड हार्बर मॉडल का ज़िक्र करते हैं.

वह कहते हैं, “यहां जो काम हुआ है, यह किसी से छिपा नहीं है. पूरे देश में इस मॉडल की चर्चा हो रही है. अब ज़िले के सभी चार संसदीय इलाक़ों में यही मॉडल लागू होगा. यह मेरी गारंटी है.”

उनका कहना है कि कोई ठोस मुद्दा नहीं होने के कारण विपक्ष घोटालों और भ्रष्टाचार के हवाई मुद्दे उठा रहा है.

वो पहले भी भाजपा को चुनौती दे चुके हैं कि अगर उनके ख़िलाफ़ एक भी आरोप साबित हो गया तो वो राजनीति से संन्यास ले लेंगे.

वर्ष 2014 में अभिषेक जब पहली बार यहां मैदान में उतरे थे तो भाजपा ने उनके ख़िलाफ़ स्थानीय नेता अभिजीत दास उर्फ बॉबी को उम्मीदवार बनाया था.

लेकिन 2019 में भाजपा ने उनकी बजाय दक्षिण दिनाजपुर के नेता नीलांजन राय को मैदान में उतारा था.

बीजेपी ने आख़िर में उतारा पुराना उम्मीदवार

इस बार इस सीट के लिए भाजपा ने सबसे आख़िर में अपने उम्मीदवार का एलान किया. अपनी पहली सूची जारी करने के करीब डेढ़ महीने बाद.

इस दौरान कयास लगाए जाने लगे थे कि पार्टी अभिषेक के ख़िलाफ़ शायद किसी हेवीवेट उम्मीदवार को मैदान में उतारेगी. लेकिन आख़िर में फिर उसी बॉबी को मैदान में उतार दिया गया.

इस दौरान भाजपा ने कई बड़े नामों को खंगाला था. लेकिन प्रदेश स्तर के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, “सबने अभिषेक के ख़िलाफ़ लड़ने से मना कर दिया था.”

बॉबी की उम्मीदवारी पर यहां राजनीतिक हलकों में हैरानी जताई गई थी. तब कहा गया था कि भाजपा ने शायद इसे एक हारी हुई बाज़ी मानते हुए ही कमज़ोर उम्मीदवार को टिकट दिया है.

लेकिन भाजपा के स्थानीय नेता और खुद बॉबी इसे तृणमूल कांग्रेस का कुप्रचार बताते हैं.

भाजपा और सीपीएम एक सुर में अभिषेक और उनकी पार्टी पर इलाक़े में आतंक फैलाने और चुनावी धांधली के आरोप लगाते हैं.

इस इलाक़े में ज़्यादातर तृणमूल के ही पोस्टर-बैनर नज़र आते हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस के लोग उनको या तो पोस्टर और बैनर लगाने ही नहीं देते या फिर फाड़ कर फेंक देते हैं.

क्या कहते हैं विरोधी दल?

भाजपा उम्मीदवार अभिजीत दास कहते हैं, “इस बार का चुनाव तृणमूल कांग्रेस के अत्याचार और हिंसा के ख़िलाफ़ है. अभिषेक के सांसद बनने के बाद बीते दस वर्षो में यहां तृणमूल कांग्रेस का आतंक बढ़ा है. उससे पहले तक यह इलाक़ा शांत था.”

सीपीएम के उम्मीदवार के उम्मीदवार प्रतीक उर रहमान भी यही बात दोहराते हैं.

वह कहते हैं, “बीते दस साल से अभिषेक बनर्जी यहां से सांसद हैं. लेकिन विकास होना तो दूर उल्टे इलाक़े में हिंसा और गुंडागर्दी बढ़ गई है. यहां लोग निडर होकर अपने मताधिकार का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते.”

कांग्रेस के साथ तालमेल के तहत यहां सीपीएम ने एक छात्र नेता प्रतीक उर रहमान को टिकट दिया है.

लेकिन कांग्रेस और वाम के साथ तालमेल के बावजूद इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के नौशाद सिद्दीक़ी ने भी यहां मजनू लस्कर को अपने उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतार दिया है. पहले नौशाद के ही यहां चुनाव लड़ने की चर्चा थी. लेकिन बाद में उन्होंने मजनू को उतार दिया.

मजनू पहली बार चुनाव मैदान में हैं. फिलहाल सीपीएम और आईएसएफ में से कौन किसके वोट बैंक में सेंध लगाएगा, इस पर भी कयास लगाए जा रहे हैं.

वर्ष 2019 में यहां सीपीएम और कांग्रेस को करीब आठ फीसदी वोट मिले थे. भाजपा को उम्मीद है कि यह दोनों टीएमसी के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाएंगे.

कैसा है डायमंड हार्बर का जातीय समीकरण

जहां तक सामाजिक समीकरणों का सवाल है इस संसदीय क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की आबादी करीब 40 फ़ीसदी और अनुसूचित जाति की 20 फ़ीसदी है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभिषेक की हैट्रिक की राह में कहीं कोई बाधा नहीं नज़र आ रही है.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, “भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने लगभग हर घोटाले में अभिषेक की भागीदारी का प्रचार किया है. वह इसी मुद्दे पर उनको घेर रही है. लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि पिछली बार अभिषेक 3.20 लाख वोटों के अंतर से जीते थे. तब उनको 56 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे. ऊपर से इस बार उनके ख़िलाफ़ ऐसा कोई उम्मीदवार नहीं है जो कड़ी चुनौती दे सके.”

उनकी दलील है कि अगर यहां चुनौती कड़ी होती तो अभिषेक इसी संसदीय क्षेत्र में सिमटे रहते. लेकिन वो तो पूरे राज्य में घूम-घूमकर प्रचार करते रहे हैं. ऐसे में इस सीट पर चुनावी नतीजे शायद ही बहुत हैरान करने वाले हों.

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