वो कांग्रेसी नेता जिसने रिलायंस पर नकेल कसी और मुकेश अंबानी तिलमिला गए

साल 2011. दिसंबर का महीना. देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस का तेल कारोबार संभाल रहे थे पी एम एस प्रसाद. उनका दिल्ली के शास्त्री भवन जाना हुआ. पेट्रोलियम मिनिस्ट्री यहीं है. वो पेट्रोलियम मिनिस्ट्री के तत्कालीन सचिव जी सी चतुर्वेदी से एक मुलाकत की इच्छा लिए आए थे. जब मिनिस्ट्री में पहुंचे तो प्रसाद को पुराने चेहरे गायब दिख रहे थे. ऐसे चहरे जो उन्हें देखते ही बड़ी मुस्कान छोड़ते थे. इस बार जिनसे सामना हुआ, उन्होंने मुस्कान से उलट प्रसाद को मिनिस्ट्री के अंदर जाने से रोक लिया. कहा-

इंतज़ार करना होगा.

प्रसाद हैरान भाव के साथ वेटिंग रूम में बैठ गए. चंद मिनटों बाद स्टाफ से एक श़ख्स आया और कहा-

आपकी मुलाकत नहीं हो सकती, आपके पास अपॉइंटमेंट नहीं है.

प्रसाद शर्मिंदा होकर बाहर निकल आए. दरअसल ये संदेश सिर्फ प्रसाद को नहीं, केजी बेसिन में मौजूद तीन बड़ी कंपनियों को था. जो देश की सबसे बड़ी पेट्रोलियम फ़ील्ड में तेल और प्राकृतिक गैस खोज रही थीं. सरकारी स्वामित्व वाली ओएनजीसी, वेदांता समूह की केर्यन के अलावा रिलायंस यहां सबसे बड़ी खिलाड़ी थी.

पिता के जाने के बाद दोनों भाइयों के बीच संपत्ति के लिए विवाद हुआ था. आज मुकेश और अनिल अंबानी अलग-अलग कारोबार कर रहे हैं.
पिता के जाने के बाद दोनों भाइयों के बीच संपत्ति के लिए विवाद हुआ था. आज मुकेश और अनिल अंबानी अलग-अलग कारोबार कर रहे हैं.

पहली बार प्रधानमंत्री वी पी सिंह के बाद कोई सरकार में ऐसा आया था जिसने अंबानी परिवार के काम पर इतनी गहरी नज़र जमाई हो. जी सी चतुर्वेदी ये सब कर पाए तत्कालीन मंत्री सुदिनी जयपाल रेड्डी के दम पर. देश के सबसे अमीर आदमी से उसी के एक्सपर्ट ज़ोन में टक्कर. ये आसान हीं था. इस टक्कर का नुकसान दोनों पक्षों को हुआ. किसे ज्यादा, किसे कम, ये राय पूरा मामला जानने के बाद बना सकते हैं. शुरुआत करते हैं ज़ीरो से-

के जी बेसिन क्या है

दक्षिण भारत की दो प्रमुख नदियां हैं- कृष्णा और गोदावरी. इनका का डेल्टा क्षेत्र है आंध्र प्रदेश के समंदर तट के पास. यहां भारी मात्रा में कच्चा तेल और गैस पाई गई है. इनके बेसिन एरिया को शॉर्ट में के जी बेसिन बोलते हैं. क़रीब 50 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका है. जिसमें 21 हजार वर्ग किलोमीटर पानी वाले इलाके में है और 28 हजार वर्ग किलोमीटर तटीय इलाका है.

जहां पॉइंट दिख रहा है ये KG Basin का ऑयल ऑफिस है.
जहां पॉइंट दिख रहा है ये KG Basin का ऑयल ऑफिस है.

तेल कंपनियां यहां कैसे-

1991 की उदारीकरण नीति का नतीजा थी 1997-98 में आई ‘नेल्प’ पॉलिसी. नेल्प मतलब- न्यू एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंस पॉलिसी. मकसद था कि सरकारी क्षेत्र के साथ-साथ निजी कंपनियां भी पैसा लगाएं और उन्हें भी तेल व्यापार में एंट्री मिले. नेल्प के नियमें के मुताबिक, सरकार और निजी कंपनियां आपस में आमदनी बांटेंगी. इसके लिए प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रेक्ट (PSC) बनाया गया. फरवरी 1999 में रिलायंस को के जी बेसिन में KG-D6 ब्लॉक मिला. ये समंदर वाले हिस्से में था. अप्रैल 2000 में कंपनी ने सरकार के साथ PSC पर साइन कर दिए. तब रिलायंस- मुकेश और अनिल नहीं बंटी थी.

धीरूभाई अंबानी के नाम पर तेल ब्लॉक

अक्टूबर 2002 में रिलायंस ने बड़ा ऐलान किया. KG-D6 में दो जगहों पर बड़ी मात्रा में गैस मिलने का दावा किया. इन जगहों को नाम दिया गया धीरूभाई-1 (D1) और धीरूभाई-3 (D3). KG-D6 ब्लॉक 7,645 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. D1 और D3 में ही सबसे ज्यादा प्राकृतिक गैस निकली है.

सरकार के साथ कॉन्ट्रेक्ट के तहत रिलायंस को अप्रैल 2012 तक 31 कुएं खोदने थे. और 80 mmscd (मिलियन मैट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन) गैस इन कुएं से निकालनी थी. अप्रैल 2012 तक का ये टार्गेट पूरा ना हो सका. न ही 31 कुएं खुदे और ना ही इतनी गैस निकाली गई. सिर्फ 14 कुएं ही काम कर रहे थे और टार्गेट से आधी, क़रीब 34.5 mmscd गैस ही निकाली जा रही थी.

ऐसा क्यों हुआ?

रिलायंस ने इसकी वजह बताई कि-

1. खुदे हुए 21 कुओं में से तीन में गैस ही नहीं निकली और 4 बाढ़, पानी और तूफान की वजह से बर्बाद हो गए
2. शुरुआती अनुमान गलत थे. KG-D6 में 80 mmscd नहीं 40 mmscd तक गैस मिलने की संभावना है.

लेकिन सरकार ने इन बातों को मानने से इनकार कर दिया. कम कुएं खुदने से सरकार को नुकसान हो रहा था. पेट्रोलियम मंत्रालय ने रिलायंस के KG-D6 ब्लॉक के विकास के नए बजट को मंजूरी देने से इनकार कर दिया. हिसाब में गड़बड़ी और तय सीमा के अंदर उत्पादन कम करने के कारण सरकार रिलायंस पर जुर्माना लगाने की तैयारी में थी.

पांच बार सांसद रह चुके हैं एस जयपाल रेड्डी. तीन बार जनता दल की टिकट पर और 2 बार कांग्रेस की टिकट पर.
पांच बार सांसद रह चुके हैं एस जयपाल रेड्डी. तीन बार जनता दल की टिकट पर और 2 बार कांग्रेस की टिकट पर.

सरकारी खजाने को नुकसान

जयपाल रेड्डी ने जनवरी 2011 में मंत्रालय संभाला तो यहां करप्शन की बू आती थी. जयपाल पहचान गए. उन्होंने PSC को संशोधित करने की तैयारी कर ली थी. तेल कारोबार में कंपनी को किसी तरह का नुकसान न हो, इसकी तैयारी पॉलिसी लेवल पर ही थी. PSC के मुताबिक, कंपनी को सरकार के साथ रेवेन्यू शेयर करने से पहले तेल खोजने और प्रोडक्शन का खर्च को 100 फीसदी रिकवर करने की इजाज़त है. अपना 100 फीसदी वसूलने के बाद-

# अगर रिलायंस लागत का 1.5 गुना कमाती है तो सरकार को 10 % रेवेन्यू मिलेगा
# अगर रिलायंस लागत का 1.5-2.0 गुना कमाती है तो सरकार को 16% रेवेन्यू मिलेगा
# अगर रिलायंस लागत का 2.0-2.5 गुना कमाती है तो सरकार को 28% रेवेन्यू मिलेगा
# अगर रिलायंस लागत का 2.5 गुना से ज्यादा कमाती है तो सरकार को 85% रेवेन्यू मिलेगा

अगर सरल शब्दों में कहें तो जितना तेल की खोज और प्रोडक्शन में खर्च होगा, उतना ही देरी से सरकार को पैसा मिलेगा.

जयपाल रेड्डी ने देखा कि न तय सीमा के अंदर पूरे 31 कुएं खोदे हैं, न ही 80 mmscd गैस का उत्पादन हो रहा है. इसके उलट कहा जा रहा था कि गैस ख़त्म हो रही है, अुनमान गलत लगाए गए थे. वगैरह-वगैरह. रिलायंस तेल खोजने के लिए क़रीब 9,100 करोड़ का नया निवेश करना चाहती थी. सरकार ने उसपर रोक लगा दी. क्योंकि नया खर्च होता तो सरकार को रेवेन्यू और देरी से आता. जबकि रिलायंस पुराने तेल के कुओं से उनकी क्षमता के मुताबिक तेल नहीं निकाल पा रही थी.

समंदर में ड्रिलिंग के लिए करीब 3 करोड़ रुपये रोजाना खर्च होते हैं.
समंदर में ड्रिलिंग के लिए करीब 3 करोड़ रुपये रोजाना खर्च होते हैं.

CAG रिपोर्ट: आग में घी

ये वो दौर था जब देश के महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट रिलीज़ कम, लीक ज्यादा होती थीं. ऐसी ही एक रिपोर्ट का ड्राफ्ट लीक हुआ था जून 2011 में. इसमें बड़े स्तर पर अनियमितताओं का ज़िक्र किया गया था. सरकारी खजाने को नुकसान की बात लिखी गई थी. रिपोर्ट में मंत्रालय और रिलायंस की मिलीभगत का ज़िक्र था. उस दौर की मिलीभगत का जब मुरली देवड़ा पेट्रोलियम मंत्री थे. CAG ने 3 मुख्य बातें उठाई थीं-

1. सरकार ने रिलायंस और केयर्न को तेल खोजने के लिए गलत तरीके से अतिरिक्त समय दिया.
2. सरकार ने रिलायंस और केयर्न को वो इलाके भी अपने पास रखने दिए जहां तेल निकला ही नहीं. कायदे से ये सरकार के हवाले होने चाहिए थे.
3. रिलायंस ने अपने खर्च को 2004 से 2006 के बीच 117% तक बढ़ाया है, जिसने सरकार पर बट्टा लगाया.

सितंबर 2011 में फाइनल रिपोर्ट आने के बाद सरकार की खूब किरकिरी हुई. जयपाल रेड्डी ने मोर्चा संभाला और सख़्ती से रूलबुक को फॉलो करना शुरू कर दिया.

रेड्डी प्रखर वक्ता थे. राहुल गांधी उनको इस चुनाव में मिस कर रहे थे.
रेड्डी प्रखर वक्ता थे. राहुल गांधी उनको इस चुनाव में मिस कर रहे थे.

जयपाल रेड्डी इन एक्शन

अपने दो साल के कम के कार्यकाल में जयपाल रेड्डी सुर्खियों में छाए रहे. रिलायंस और पूरी पेट्रोलियम लॉबी को रूलबुक के हिसाब से चलाते रहे. CAG कि रिपोर्ट सितंबर 2011 में आई थी. जयपाल को 10 जनवरी, 2011 को पेट्रोलियम मंत्री बनाया गया था. वो तभी से एक्शन मोड में थे. मानो मुरली देवड़ा के समय की कारगुजारियों से भली-भांति परिचित थे. कई बार रिलायंस के कामों पर रोक लगी. जैसे-

1. अप्रैल 2011 में तेल खोजने के लिए रिलायंस की ओर से बजट सौंपा गया था. जिससे इनकार कर दिया गया.
2. मंत्रालय ने तेल खान के विकास के लिए होने वाले खर्च को नकार दिया.
3. अप्रैल 2014 से पहले गैस के दाम बढ़ाने पर साफ इनकार कर दिया.
4. रिलायंस और ब्रिटिश पेट्रोलियम कंपनी की डील पर रोक.
5. महानदी में मिले तेल ब्लॉक को कमर्शियल सर्टिफिकेट देने से इनकार.

अंबानी के कारोबार पर बुरी मार

2008 की वैश्विक मंदी के बाद ये पहली बार हुआ थी कि रिलायंस के शेयर बहुत ख़राब परफॉर्म कर रहे हों. मुकेश अंबानी की ओर से भी कोई बयान नहीं आ रहा था. 2011 के शुरूआती महीनों में रिलायंस के शेयरों में 37% गिरावट आई थी. 24 नवंबर, 2011 को खुद अंबानी प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से मिलने पहुंचे थे. मामला इतना बढ़ गया था कि मध्यस्थता के लिए नोटिस तक भेजना पड़ा. मुकेश अंबानी पूरे विवाद से इतना खफा थे कि दिसंबर 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ रूस की यात्रा पर बार-बार बुलाने के बाद भी नहीं गए थे.

मुकेश अंबानी की रिफाइनरी है जाम नगर, गुजरात में है.
मुकेश अंबानी की रिफाइनरी है जाम नगर, गुजरात में है.

मुकेश अंबानी के लिए पुराने दिन अच्छे थे. क्योंकि मुरली देवड़ा के अंबानी परिवार के साथ पारिवारिक संबंध थे. 2006 से 2011 बजे तक उनके किए काम स्कैनर में थे. जैसे- रिलायंस को तेल खोजने के लिए 2.4 बिलियन डॉलर के मुकाबले 8.8 बिलियन डॉलर खर्च करने की अनुमति दे दी. अलॉट किए ब्लॉक में जो खाली जगह वापस लेनी चाहिए थी, उसे भी मुरली देवड़ा ने वापस नहीं लिया.

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ऐसा सुनने में आता है कि मुकेश अंबानी मुरली देवड़ा को चाचा बुलाते थे. मुरली देवड़ा को पेट्रोलियम मंत्रालय मिलने पर अमरीकी एंबेसी ने लिखा था कि

मुरली देवड़ा का उर्जा क्षेत्र में बड़ा कारोबार करने वाले रिलायंस ग्रुप के साथ लंबे समय से रिशता थोड़ी दिक्कत की बात है

मुरली देवड़ा के कार्यकाल ने कांग्रेस की खूब छीछालेदर करवाई है. मंत्री से लेकर संतरी तक, सब पेट्रोलियम लॉबी की जान पहचान के थे.

जब रेड्डी पेट्रोलियम मंत्रालय में आए थे, तब उन्होंने सचिव से लेकर चपरासी तक, पूरा स्टाफ बदल डाला था. इन पर कंपनियों के लिए लॉबिंग करने का आरोप था. पूरी नई टीम आई. जिन पर भी जांच चल रही थी, उन्हें 2 मिनट में ही ट्रांस्फर के बारे में बता दिया गया था. रेड्डी अधिकारियों को चाय-कॉफी पर बुलाते थे और ट्रांस्फर के बारे में जानकारी देते थे.

कैलेंडर बदला. तारीख आई 28 अक्तूबर 2012 की. कैबिनेट में एक और फेरबदल हुआ. यूपीए सरकार पहले से भ्रष्टाचार के आरोप झेल रही थी. अन्ना आंदोलन अपने उफान पर था. इन हालातों में जयपाल रेड्डी से पेट्रोलियम मंत्रालय वापस लेने के फैसले ने अच्छा-खासा हंगामा खड़ा कर दिया. पूरा विपक्ष जयपाल रेड्डी के ईमानदार होने की कसमें खाने लगा. जयपाल रेड्डी भी आलाकमान के इस फैसले से खुश नहीं थे. उन्हें पेट्रोलियम से हटाकर विज्ञान और टेक्नोलॉजी मंत्रालय दिया गया था.

सरकार और कांग्रेस के अलावा सब मानते हैं कि जयपाल रेड्डी को अंबानी से टकराव की वजह से मंत्रिपद गंवाना पड़ा.
सरकार और कांग्रेस के अलावा सब मानते हैं कि जयपाल रेड्डी को अंबानी से टकराव की वजह से मंत्रिपद गंवाना पड़ा.

सियासत की भाषा में इसे किनारे लगाया जाना कहा जाता है. उन्होंने नए मंत्रालय का पदभार ग्रहण करने में देरी की. काफी मनौव्वल के बाद उन्होंने आखिरकार अपना पदभार ग्रहण किया. जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या वो इस वजह से दुखी हैं?
जयपाल रेड्डी ने सधे हुए प्रवक्ता की तरह कहा,

कैबिनेट में किसको रहना चाहिए ये प्रधानमंत्री का फैसला है. मुझे लगता है कि किसी को उनके अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं देना चाहिए.

पूर्व केंद्रीय मंत्री को दो चीजों के लिए जाना जाता था. पहला विचारधारा के प्रति उनकी सनक और दूसरा उनकी बहस करने की विलक्षण प्रतिभा. और ये उनके काम में भी दिखा. सरकार और कांग्रेस के अलावा हर किसी ने माना कि एस. जयपाल रेड्डी को अंबानी के रथ को रोकने की सजा मिली थी.

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