दोस्ती से पहले पड़ी दरार!

आरएसएस, जमीयत उलेमा, मौलाना सैयद अरशद मदनी, शाही इमाम मौलाना

अगस्त की 30 तारीख की रात को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना सैयद अरशद मदनी सांप्रदायिक सौहार्द के लिए मिलकर काम करने के लिए एकमत हुए. लेकिन दिल्ली स्थित संघ कार्यालय, केशवकुंज के बंद कमरे में उनके बीच दोस्ताना अंदाज में जो बातचीत हुई वह ज्यादा देर तक टिक नहीं पाई. दरअसल, संघ अपनी परंपरागत कार्यशैली (गुपचुप) के तहत सांप्रदायिक सौहार्द के मुद्दे पर बढऩा चाह रहा था जबकि मौलाना मदनी ने इस गोपनीय बैठक की चर्चा को प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए सरेआम कर दिया. इस वाकये से संघ असहज है. दिल्ली में संघ प्रचार प्रमुख राजीव तुली कहते हैं, ”यह बैठक व्यक्तिगत और गोपनीय थी. संघ की यह नीति रही है कि व्यक्तिगत चर्चा को व्यक्तिगत ही रहने दिया जाता है.”

तुली का कहना है कि वैसे भी यह कोई पहली बैठक नहीं है, इससे पहले भी इस तरह की कई मुलाकातें हो चुकी हैं. इसकी नींव संघ के पूर्व प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने रखी थी. मौलाना मदनी के इस गोपनीय बैठक को सार्वजनिक कर देने के सवाल पर वे कहते हैं, ”उन्हें जो कहना है, करना है वे करें पर संघ व्यक्तिगत और सार्वजनिक बैठक के मायने अच्छी तरह जानता है.” तुली ने संघ की गोपनीयता की परंपरा का हवाला देकर उस बैठक में हुई चर्चा के बारे में बात करना मुनासिब नहीं समझा.

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के लिए जब दोनों संगठन एकमत हो रहे हैं तो फिर इस बात के सार्वजनिक होने से इतनी तल्खी क्यों? संघ सूत्रों का कहना है, ”राम मंदिर मुद्दे पर बहुत जल्द फैसला आना है और संघ की इसमें बड़ी भूमिका है, खासकर फैसला आने के बाद सांप्रदायिक सौहार्द कायम रखना चुनौतीपूर्ण काम है.” संघ का मानना है कि ऐसे काम को सार्वजनिक करने से उसका उद्देश्य हासिल नहीं हो पाता. संघ और मुस्लिम संगठन साथ काम कर रहे हैं, यह बात सार्वजनिक कर देने के बाद कई सवाल उठ खड़े होते हैं, लेकिन अगर चुपचाप काम शुरू कर दिया जाए तो सवालों के लिए जगह ही नहीं बचती.

उधर, जमीयत की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक, बैठक में मौलाना मदनी ने देश के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय के बीच व्याप्त डर, भीड़ की हिंसा, कश्मीर में अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को खत्म करने के बारे में बात के साथ ही तीन तलाक के मुद्दे पर भी बातचीत की. मौलाना मदनी फिलहाल दिल्ली से बाहर हैं. उनसे बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने साफ कह दिया कि वे फोन पर इस मसले को लेकर कोई बात नहीं करेंगे.

सूत्रों की मानें तो इस तरह की बैठक में हुई चर्चा के सार्वजनिक होने से दोनों ही संगठनों से जुड़े लोग असहज हैं. खासकर संघ के जमीनी स्वयंसेवक को मदनी का खुलेआम यह कहना रास नहीं आ रहा कि वे वी.डी. सावरकर और एम.एस.एस. गोलवलकर के विचारों से सहमत नहीं हैं. इसको लेकर स्वयंसेवकों में नाराजगी है. सूत्रों की मानें तो मौलाना मदनी को अब इस मुद्दे पर खासतौर पर मीडिया से बातचीत करने के लिए मना किया गया है.

वहीं, चांदनी चौक स्थित फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना डॉ. मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम कहते हैं, ”25 साल पहले जब दिल्ली में साहेब सिंह वर्मा की सरकार थी, तब राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ हमने भी ऐसी कई बैठकें कीं. लेकिन मीडिया को हमेशा इससे दूर ही रखा गया. पर जैसा कि मैं समझता हूं, संघ प्रमुख और जमीयत प्रमुख के बीच बेहद दोस्ताना चर्चा हुई. ऐसे में अगर यह सारी बातें बाहर आ भी गईं तो मैं नहीं समझता कि कोई दिक्कत है. हालांकि आजकल के माहौल को देखते हुए ऐसी बैठकों की चर्चा होने से ज्यादा जरूरी है बैठक के मकसद को हासिल किया जाए.” 2003 में आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार और विश्व हिंदू परिषद के विष्णु डालमिया एवं मुस्लिम बुद्धिजीवियों के बीच बातचीत का आयोजन कर चुके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की गवर्निंग बॉडी के सदस्य मुफ्ती मो शमुन काज़मी भी इस बैठक से बेहद उत्साहित हैं. हालांकि वे भी मौलाना मदनी के इस रवैए से हैरान हैं. वे कहते हैं, ”मदनी जी बेहद जहीन हैं. लेकिन ऐसे संजीदा मसलों पर गोपनीयता तोड़ना ऐसी मुलाकातों के मकसद को ठेस पहुंचाना है.”

सूत्रों की मानें तो दोनों संगठनों के प्रमुखों की मुलाकात की पटकथा दो साल पहले से लिखी जा रही थी. जमीयत प्रमुख मौलाना मदनी और संघ प्रमुख भागवत से मुलाकात भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय संगठन महामंत्री और संघ के सहसंपर्क प्रमुख रामलाल ने कराई है. इस मुलाकात के पहले जमीयत के वरिष्ठ पदाधिकारियों के बीच कई दौर की बैठक और बातचीत हो चुकी थी. लेकिन संघ और जमीयत का मेल-मिलाप क्या किसी नतीजे पर पहुंच पाएगा.

राम मंदिर के मुद्दे पर बहुत जल्द फैसला आ सकता है, ऐसे में संघ सांप्रदायिक सौहार्द के लिए आगे बढऩा चाहता है.

SOURCE: INDIATODAY

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