इंदिरा गांधी की राह पर हैं प्रियंका, क्या है वायरल तस्वीर का रिश्ता?

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कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में जमीन विवाद में मारे गए गोंड आदिवासी परिवारों से मिलने पर अड़ी हुई हैं. सोनभद्र जाते हुए उन्हें शुक्रवार को बीच रास्ते में रोक दिया गया, जहां वह धरने पर बैठ गईं. बाद में उन्हें हिरासत में लेकर चुनार किला ले जाया गया. वहां भी वह दोबारा धरने पर बैठ गईं.

पीड़ित आदिवासियों की आवाज उठाने की प्रियंका गांधी के इस प्रयास की सोशल मीडिया की दुनिया में तारीफ हो रही है. अक्सर लोग प्रियंका गांधी में लोग उनकी दादी इंदिरा गांधी का अक्स देखते हैं. धरने पर बैठी प्रियंका गांधी की तस्वीर से मिलती-जुलती इंदिरा गांधी की धरना देती एक तस्वीर यूजर्स शेयर कर रहे हैं. इस तस्वीर में इंदिरा गांधी गुलाबी साड़ी में बीच सड़क में धरने पर बैठी नजर आ रही हैं.

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प्रियंका और इंदिरा गांधी की इस तस्वीर को जोड़कर फिर से समर्थक कांग्रेस के उभरने की उम्मीद कर रहे हैं. इंदिरा गांधी की इस तस्वीर के बारे में पता नहीं कब और किस घटना की है, लेकिन यह सच है कि 1977 में सत्ता से बाहर रहने के दौरान इंदिरा गांधी ने बिहार के एक गांव बेलची में हुए दलितों के नरसंहार के बाद पीड़ितों से मिलने पहुंची थीं. इस नरसंहार में 11 दलितों की हत्या कर दी गई थी.  

इंदिरा गांधी 13 अगस्त 1977 को नरसंहार के पीड़ितों से मिलने के लिए बेलची पहुंची थीं, जहां बाढ़ जैसे हालात थे. उस समय बाढ़ की वजह से इंदिरा गांधी को हाथी पर चढ़ कर बेलची गांव पहुंचना पड़ा था. इंदिरा गांधी पीड़ित परिवारों से मिलीं और उन्हें ढांढस बढ़ाया. कहा जाता है कि बेलची की यात्रा के बाद से ही इंदिरा गांधी की फिर से सत्ता वापसी की शुरुआत हुई. अपनी किताब ‘ऑल द प्राइम मिनिस्टर्स मेन’ में पत्रकार जनार्दन ठाकुर ने इस घटना का जिक्र किया है.

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अगस्त 1977 में बेलची पहुंचीं इंदिरा गांधी

उस समय टाइम्स ऑफ इंडिया में रिपोर्टर रहे हेमेंद्र नारायण झा ने भी इंदिरा गांधी की बेलची यात्रा पर लिखा है. हेमेंद्र नारायण लिखते हैं, ”13 अगस्त 1977 को इंदिरा गांधी का हाथी पर चढ़कर बेलची आने के बाद कई तरह की कहानियां हैं. ज्यादातर कहानियों में दलितों के प्रति उनके इस भाव की तारीफ की होती है. इंदिरा गांधी आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में अपनी हार के बाद बेलची पहुंची थीं.’

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वह लिखते हैं कि, ‘ हवाई जहाज से जब वह उतरीं तो कहीं ज्यादा दमक रही थीं. रिमझिम बारिश हो रही थी और इंदिरा गांधी एक गुलाबी रंग का रेनकोट पहन कर नीचे उतरीं. उनके साथ के लोग न चाहते हुए भी भीग रहे थे. उन्हें बेलची जाना था. बेलची में 11 लोगों की नृशंस हत्या कर दी जिसमें एक मासूम बच्चा भी था. एयरपोर्ट पर उन्होंने घोषणा की कि “मैं यहां मृत लोगों के परिजनों से अपनी संवेदना व्यक्त करने आई हूं.” सभी रुकावटों के बावजूद वह बेलची जाने पर अडिग थीं.’

बेलची गांव पटना जिले की सीमा पर बसा है और आजकल यह नालंदा जिले में आता है. हरनौत-सकसोहरा रोड पर यह गांव 13 किलोमीटर दूर पड़ता है. हरनौत तक राजमार्ग के जरिये आसानी से पहुंचा जा सकता है.

हेमेंद्र नारायण लिखते हैं, ‘तब यहां बाढ़ आई हुई थी. गांव के चारों तरफ बारिश का पानी भरा हुआ था. इंदिरा गांधी पहले जीप से निकलीं, लेकिन कीचड़ में जीप फंस गई. जीप को ट्रैक्टर से खींचकर निकालने की जुगत की गई, लेकिन काम नहीं आया. वह उतर कर पैदल ही चल पड़ीं. उनके साथ बिहार कांग्रेस के कई सारे नेता भी नंगे पांव चल रहे थे और जैसा कि होना ही था ज्यादा देर नहीं चल सके. फिर तय हुआ कि हाथी के अलावा कोई और साधन नहीं हो सकता.’

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इंदिरा गांधी के साथ दिल्ली से ही पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह भी थीं. मोहाने नदी से पहले नारायणपुर गांव में इंदिरा गांधी हाथी ‘मोती’ पर चढ़ीं. प्रतिभा सिंह ने उन्हें चढ़ाने में मदद की. नदी में पानी बढ़ा हुआ था, लेकिन हाथी को उसे पार करने में कोई मुश्किल नहीं हुई. बाकी लोग एक नाव से पार हुए.

हेमेंद्र नारायण बताते हैं कि इंदिरा गांधी ने वह जगह देखने की इच्छा जाहिर की, जहां लोगों की हत्या हुई थी. वह जगह गांव के किनारे मक्के के खेतों के बीच थी. बांसों से घिरी उस जगह तक पहुंचने के लिए हाथी को खेतों में ही घुसाकर ले जाया गया. वहां उस समय तक मृतकों की अधजली हड्डियां पड़ी थीं. छापामारों ने उनकी हत्या से पहले वहां चिताएं तैयार कीं और फिर दलितों को लाइन में खड़ा कर गोली मार दी थी.

हेमेंद्र नारायण के मुताबिक बेलची में दलितों का नरसंहार बिहार में कोई पहली घटना नहीं थी. जनवरी से सितंबर 1967 तक दलित जातियों पर हमले की 1100 घटनाएं दर्ज की गईं जिनमें 57 लोग मारे गए. बेलची मामले में जून 1977 में आरोपपत्र दाखिल हुआ लेकिन जनता पार्टी की सरकार रहते सुनवाई शुरू नहीं हो पाई थी. फरवरी 1980 में सुनवाई शुरू हुई और मई 1980 में फैसला आया. दो अभियुक्तों जिसमें से एक महावीर महतो भी था, जिसे फांसी की सजा हुई और 15 को आजीवन करावास. एक अभियुक्त इंद्रदेव चौधरी निर्दलीय विधायक भी बना और पेरोल पर रिहा रहते हुए मरा. बाकी ने आजीवन कारावास पूरा किया.

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